” क्रीडा से निर्माण चरित्र का, चरित्र से निर्माण राष्ट्र का ” इस बोध वाक्य के साथ खेलों के माध्यम से आरोग्य संपन्न राष्ट्र निर्माण के लिए क्रीडा भारती की स्थापना पुणे (महाराष्ट्र) में वर्ष १९९२ में की गई। क्रीडा भारती का मुख्य उद्देश देश के अन्य स्थापित खेलोंके साथ स्वदेशी खेलों एवं ग्रामीण क्षेत्रोंके परम्परागत खेलोंको बढावा देना है, ताकि समाज के सभी वर्ग मैदानपर आकर खेले तथा खेलों के माध्यम से स्वस्थ शरीर, तीक्ष्ण बुद्धि, मानसिक व संस्कार प्राप्त कर खिलाडी में राष्ट्रिय चरित्र की भावना का निर्माण हो।
किसी एक खेल का विचार न रखते हुए सभी खेलोंका विचार करनेवाली संघटना का रूप “क्रीडा भारती” हे। महाराष्ट्रमें कार्य विस्तार के बाद वर्ष २००९ में क्रीडा भारती को अखिल भारतमें विस्तार करने हेतु अ. भा. क्रीडा भारती की स्थापना मा. चेतनजी चौहान की अध्यक्षतामें हुई। गत चार वर्षमें देशके लगभग सभी प्रांतोंमें कार्य प्रारंभ हुआ हे।

क्रीडा भारती का बोधचिन्ह

कोई भी संस्था का बोधचिन्ह,उस संस्था का संक्षेप में परिचय करा देता है , केवल बोधचिन्ह ही संस्था की सारी बाते बात देती है उपयुक्त बोधचिन्ह क्रीडा भारती का कार्य ऒर लक्ष्य प्रकट करता है।
शरीर ,बुद्धी का विकास एव मन परसंस्कार इन त्रिगुणो पर क्रीडा भारती का कार्य ऒर लक्ष्य केंद्रित है। समभूज त्रिकोण इसका प्रतिक है। मन पर संस्कार के विश्वास पर शरीर का विकास एव बुद्धी का विकास यह समभूज त्रिकोण की रेखाऐ है।
शीर्षस्थ समभूज त्रिकोण यह भारतीय संस्कृती का मंगल चिन्ह भी है। क्रीडाज्योत खेळ जगात का परिचय है। हमे खेल जगत में अपने संघटन को बढाना है। अग्नी शुद्धता का परिचय कराती है।
हमारा कार्य तंदुरुस्त शरीर एव तिष्ण बौद्धिक विकास से शुद्ध चारित्र्य का निर्माण यह हमारा लक्ष्य है। अग्नीद्वारा शुद्धता हमारे शुद्ध कार्य की परीचायक है। हमारा कार्य हमे पुरे विश्व में करना है। इसलिये पृथ्वी रूप गोल , समभूज त्रिकोण के अंतगर्त हमने चिन्ह में अंकित किया है।